31.5.11

साहित्यकार बहेलियों के कुत्तों की भूमिका ना निभायें ...

बहेलियों के पास शिकारी कुत्ते होते हैं. खरगोश, लोमड़ी, हिरन, आदि जानवरों के पीछे उन्हें दौड़ाते हैं.कुत्ते कई मील दौडक़र, भारी परिश्रम के उपरान्त शिकार दबोचे हुए मुँह में दबाये घसीट लाते हैं. बहेलिये उससे अपनी झोली भरते हैं और कुत्तों को एक टुकड़ा देकर सन्तुष्ट कर देते हैं. यही क्रम आज विद्या, बुद्धि के क्षेत्र में चल रहा है .

पुस्तक-प्रकाशक बहेलिए -तथाकथित साहित्यकारों से चटपटा लिखाते रहते हैं . गन्दे, अश्लील, कामुक, पशु प्रवृत्तियाँ भडक़ाने वाले, चोरी, डकैती, ठगी की कला सिखाने वाले उपन्यास यदि इकट्ठे किए जाएँ, तो वे एवरेस्ट की चोटी जितने ऊँचे हो जाएँगे. अबोध जनमानस उन्हीं विष-मिश्रित गोलियों को गले निगलता रहता है .

चूहों को मारने की दवा आटे में मिलाकर गोलियों बनाकर बिखेर दी जाती हैं . उन्हें खाते ही चूहा तड़प-तड़प कर मर जाता है. यह साहित्य ठीक इसी प्रकार का है . इसे पढऩे के बाद कोई अपरिपक्व बुद्धि पाठक वैसा ही अनुकरण करने के लिए विवश होता है .

आज अनेक साहित्यकार बहेलियों के कुत्तों की भूमिका प्रस्तुत कर रहे हैं. अनेक प्रकाशक और विक्रेता मालामाल हो रहे हैं. कुछ टुकड़े खाकर यह साहित्यकार पाठकों का माँस इन आततायियों के पेट में पहुँचाने में अपनी विद्या, बुद्धि, कला-कौशल का परिचय दे रहे हैं .

विद्या माता को व्यभिचारिणी वेश्या के रूप में जिस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, उसे देखकर यही कहना पड़ता हैं – " हे भगवान! इस संसार से विद्या का अस्तित्व मिटा दो, इससे तो हमारी निरक्षरता ही अच्छी है "

-पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना ...

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23 टिप्‍पणियां:

  1. भाई हम तो आपकी इस धुरंधर उपमा के कायल हो गए

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  2. mhendr bhaai kyaa satik baat likh daali hai meri to subah gad gad ho gayi ise pdh kar bdhaai ho ,,,akhar khan akela kota rajsthan

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  3. सही मुद्दा उठाया है आपने। साहित्यकार अधिक जिम्मेदार है।

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  4. एक जरुरी पोस्ट साहित्य के परिवर्तन और उसके उपयोग्य को दर्शाती, आभार ....

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  5. आपने बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है और बहुत ही बेबाकी से आपनी राय रखी है... साहित्य के क्षेत्र में फैले इसी भ्रष्टाचार के कारण लोग धीरे-धीरे साहित्य से दूर होते जा रहे हैं...

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  6. शर्मा जी, आजादी वाकई में हमारे निरक्षर देशवासियों के कारण ही मिल सकी..

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  7. शर्माजी,

    सादर अभिवादन.

    आपकी टीप से सहमत हूँ हमारे देश को स्वतंत्र करने में निरक्षरों की भूमिका थी पर वे निरक्षर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देश के लिए तन मन धन से समर्पित थे ... उनमें देश प्रेम का जज्बा था पर आज धन कमाने की होड़ में लोगबाग अपनी असल भूमिका और देश के प्रति क्या दायित्व हैं भूलते जा रहे हैं . क्षमा करेंगे . उस समय के तत्कालीन साहित्कार भी स्वतंत्रता के लिए तन मन धन से समर्पित थे ....

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  8. हम्म!! चिन्तनपरक बात....

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  9. you have pointed out a very burning issue.
    nicely expressed !!

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  10. “बहेलियों के कुत्ते...” वाह क्या उपमा है और क्या सशक्त ताना बाना है....
    पंडित शर्मा जो को नमन...
    आपका सादर आभार...

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  11. समीर जी,
    आपके इस भारीभरकम " हम्म!! " से तो मैं डर गया हूँ .... आभार

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  12. आपने कम शब्दों के इस्तेमाल से बहुत खुबसूरत बात कही | पर मेरा सोचना है की जहां गलत साहित्य आ रहा है वहां कुछ सही भी जरुर मिलेंगे हाँ हमें बस उसे खोजने की आवशकता है | क्युकी दुनिया में अगर बुराई है तो अच्छाई भी अभी जीवित है हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए |

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  13. महेंदर जी आप की सभी बातो से सहमत हे, बहुत सुंदर लेख धन्यवाद

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  14. बाहर, अन्दर, सभी दिशा में,
    अग्नि व्यक्त है, भभक रही है,

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  15. मिश्र जी, साहित्यकार न तो कुत्ता होता है न चूहा, और जो कुत्ता या चूहा है वह साहित्यकार नहीं है :)

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  16. गजब की उपमा दी है आपने। चंद्र मौलेश्वर जी की बात ध्यान देने योग्य है।

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  17. बहुत अच्छी पोस्ट...

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  18. सार्थक चिंतन है आचार्य जी
    प्रस्तुतिकरण के लिए आभार मिसिर जी।

    राम राम

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