23.4.11

एक विचार : जैसे करनी और कथनी और बाद में है वैसी भरनी ....

हाल में ही ब्लागजगत के जाने माने कलमकार नाम याद नहीं आ रहा है का एक बड़ा अच्छा लेख " करनी और कथनी" पढ़ा . लेख बड़ा रोचक लगा . लेखक महोदय ने बड़े ही रोचकता के साथ करनी और कथनी में भेद बताया . करनी और कथनी में बहुत ही अंतर होता है .

जो सिद्धांतवादी नहीं होते हैं जिनका कोई व्यक्तित्व नहीं होता है ऐसे लोग कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं . इस तरह के लोग सभी वर्गों में पाए जाते हैं चाहे वह नेता हो व्यापारी हो या नौकरशाह हो . ऐसे लोगों को आप दुंहमुँहे सांप कह सकते हैं . अभी हाल में इस तरह का उदाहरण देखने में आया है .

भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन चला रहे अन्ना साहब के विरुद्ध कपिल सिब्बल साहब और दिग्गी राजा ने पहले विरोध करने की मुहिम चलाई और उनके खिलाफ खिलाफ खूब अनाप शनाप बयानबाजी की और अंत में सरेंडर होकर उनसे क्षमा मांग ली .

भ्रष्टाचारी इसीलिए विरोध कर रहे हैं की कहीं लोकपाल बिल बन गया तो उनकी कलई खुल जाएगी और जिंदगी में जो करा धरा है वह उजागर हो जाएगा .

ऐसे लोग अभी से सफाई देने लगे हैं की लोकपाल विधेयक किस किस पर लागू होगा और किस किस पर लागू नहीं होगा जबकि अभी लोक पाल बिल में क्या क्या प्रावधान किये जायेंगें और यह किस तरह से लागू किया जायेगा मात्र विचार विमर्श ही हो रहा है अभी तो सदन में वह बिल लाया भी नहीं गया है .

ऐसे लोगों की करनी और कथनी में अंतर है तभी तो विरोध करने पर उतारू हैं . हाँ एक बात जरुर कहना चाहूँगा की समाजहित देशहित और व्यक्ति विशेष की मर्यादा और इज्जत का ख्याल करते हुए किसी अच्छे उद्देश्य के लिए , अपनी कथनी को बदलना कभी कभी गलत नहीं होता है .

पड़ोस के मुल्क पकिस्तान को ले लीजिये जिसकी करनी और कथनी में जमीन आसमान का अंतर है ... कहता कुछ है और करता कुछ है .

करनी और कथनी का अंतर उन लोगों में पाया जाता है जिनका कोई व्यक्तित्व और कृतित्व नहीं होता है . आभासी जगत में भी कई लोग हैं जिनका नाम नहीं लेना चाहूँगा जिनकी करनी और कथनी में जमीन आसमान का अंतर हैं . कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं और बताते कुछ और हैं .

असल जिन्दगीं में झांक कर देखें तो देखने में पता करने पर कुछ और नजर आते हैं और आभासी जगत में ईमानदार और समाजसेवी नजर आते हैं . जिनकी करनी और कथनी में अंतर होता है वे कभी न कभी सबके सामने बे नकाब हो जाते हैं और एक दिन सत्यता सबके सामने सर चढ़कर बोलती और सामने आती है .

व्यक्ति के व्यक्तित्व और कृतित्व का आंकलन सभी करते हैं और इस आंकलन से व्यक्ति के अच्छे होने या बुरा होने का पता चल जाता है . करनी और कथनी व्यक्ति के सिद्धांतों पर निर्भर करती है और इनमे अंतर न हो इसीलिए व्यक्ति को सिद्धांतवादी होना जरुरी है . चलते चलते एक बात और यदि व्यक्ति की करनी और कथनी में अंतर होता है जो आगे जाकर जैसी करनी वैसी भरनी पड़ती है यह बात हमारे बुजुर्ग हमें सदियों से बतियाते चले आये हैं ....


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24 टिप्‍पणियां:

  1. अनूप शुक्ल साहब का है, कथनी और करनी में अंतर वाला लेख...

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  2. एकदम बजा(सही) फ़रमाया पंडितजी आपने।

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  3. सबको अपना स्वार्थ दिखता है इसमें।

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  4. achhi post.....sundar vyakhya....

    lekin chacha.....itni tazi aur hasin
    post ke lekhak ka naam yad nahi....?

    pranam.

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  5. कथनी और करनी के अन्तर वाले लोगों से ही ये दुनिया भरी पडी है ।

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  6. कथनी और करनी टाइप एक पोस्‍ट निशांत मिश्रा जी की भी आई है.

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  7. अद्भुत व्यंग!
    प्रणाम

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  8. बचके रहना रे बाबा ...
    शुभकामनायें मिश्र जी !

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  9. हाँ, इस तरह की एक पोस्ट कहीं दिखी तो थी...सही कह रहे हैं आप...

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  10. महेंद्र जी!
    इस कीचड़ उछाल युग में यह भेद कर पाना तो मुश्किल है कि कथनी और करनी में कितना अंतर है। दर असल हम लोगों को इतने नज़दीक से कहां जान पाते हैं कि भेद कर पाएं। फिर भी हम दूसरे का दोष देखने के बजाय अपने ही चरित्र को निर्मल रखने का प्रयास करें।
    अच्छा मुद्दा उठाया आपने। सुचिता पर "सफेद घर" के सतीश पंचम ने भी ऐशा ही कुछ आरोप किसी पर लगाया था।

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  11. आदरणीय डॉ. दलसिंगार यादव जी,

    मैं आपके विचारों से शत प्रतिशत सहमत हूँ की हमें एक दूसरे का दोष देखने के बजाय अपने ही चरित्र को निर्मल रखने का प्रयास करना चाहिए ...

    आभार

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  12. हमे तो नही पता जी किसी ओर के बारे,अगर हम ने ऎसा किया हो तो माफ़ी चाहेगे, वैसे हमारे पास समय भी नही ओरो की ओर देखने का...

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  13. विचारोत्तेजक प्रस्तुति।

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  14. आजकल तो कथनी और करनी में समानता दिखती ही नहीं....

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  15. कथन होता है मुह से...
    करन होता है हाथ से...
    मुह चलाने के लिए ताक़त की ज़रूरत कम पड़ती है इसलिए बहुत चलाई जाती है...
    हाथ चलाने के लिए ताक़त की जादा ज़रूरत पड़ती है इसलिए चलाई नहीं जाती...
    इसीलिये कथनी और करनी में अंतर आता है... शायद.... :))

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  16. दुनिया में सबकी कथनी और करनी एक हो .. तो फिर चिंता कैसी ??

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  17. सबको अपना स्वार्थ दिखता है इसमें। सार्थक लेख|

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  18. करनी और कथनी व्यक्ति के सिद्धांतों पर निर्भर करती है और इनमे अंतर न हो इसीलिए व्यक्ति को सिद्धांतवादी होना जरुरी है ..

    I agree !

    .

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  19. यह तो युगों से सुनते आ रहे हैं पर भ्रष्टाचारी तो हर युग में मज़े कर रहे हैं:)

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  20. बड़े भैया
    सच में , एक विचारोत्तेजक आलेख ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया.
    - विजय तिवारी ' किसलय'

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  21. ठीक लिखा जैसी करनी वैसी भरनी।

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आपका ब्लॉग समयचक्र में हार्दिक स्वागत है आपकी अभिव्यक्ति से मेरा मनोबल बढ़ता है .