29.6.16

... देश में राजनेता राजा और साधु-संत महाराजा ...


किसी समय राजबाड़ा और देश का राजा ही सर्वोच्च होता था और प्रजा को उसके हर आदेश का पालन करना पड़ता था । राजा को यह अधिकार होता था कि वो जो भी कहें जनता उसे माने यदि जनता राजा के आदेशों का पालन नहीं करती थी तो राजा को अधिकार होता था कि उसे दंड दें और जनता को राजा के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य करें । राजा देश का खर्चा चलाने के लिए जनता से टैक्स और लगान वसूल करता था और उसे अपनी मनमर्जी से खर्च करता था चाहे देश की जनता का भला हो या न हो ।

आज देश में राजनेता ही राजा हैं वे जो कुछ चाहते हैं वही कर रहे हैं चाहे जनता के साथ साथ विपक्ष ही उनका प्रबल विरोध क्यों न करें । देश में दिनोंदिन मंहगाई बढती जा रही है पर हमारे देश के कर्णधार फर्जी आंकड़े प्रस्तुत कर जनता को गुमराह कर बता रहे हैं कि मंहगाई बिल्कुल नहीं बढ़ी है और हमारा देश विकास कर रहा है और जनता मंहगाई के कारण कारण त्राहि त्राहि कर रही है । अब तो आरबीआई भी सरकार को सलाह दे रही है कि खाने पीने की सामगी में निरन्तर बढ़ोतरी होने के कारण अधिकाधिक मंहगाई बढ़ गई है अब आगे देखने वाली बात होगी कि आरबीआई की सलाह पर हमारे देश के कर्णधार राजनेता नेता जनता के हित में मंहगाई घटाने हेतु क्या कार्यवाही करते हैं या नहीं ये अब उनकी मर्जी ।

जनता भी अब जानने लगी है कि उनकी गाडी कमाई से उलजुलूल टैक्स वसूल कर नेतागण अपनी मर्जी से खर्च कर रहे हैं । कोई नेता देश की रकम को विदेश में दान कर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास कर वाहवाही लूट रहा है तो कोई जनता की गाढ़ी कमाई को बुलेट ट्रैन सेमी बुलेट ट्रैन चलाने के नाम पर फूंक देने को आमादा है जैसे नेताजी की कमाई की रकम हो या उनकी कोई खानदानी रकम हो । देश की जनता की रकम को दूसरे देश को दान करने से या देश में मंहगी बुलेट ट्रैन चलाने से आम जनता को कोई फायदा नहीं होने वाला है।  मंहगाई के कारण जनता की दिनोदिन आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है।  देश के लोकतांत्रिक राजाओं के कारण देश में अमीर दिनोदिन अमीर होता जा रहा है और गरीब दिनोदिन गरीब होता जा रहा है ।

इसी तरह देश के साधु संत भी राजे महाराजाओं की तरह रहने लगे हैं । देश में धार्मिक प्रवृत्ति के अधिकतर लोगबाग रहते हैं उसका फायदा आजकल के साधु संत उठा रहे हैं । कभी जनता से परिक्रमा कराने के नाम से तो कभी गौ सेवा की नाम पर तो कभी विश्व का सबसे बड़ा मंदिर बनाने के नाम पर धर्मभीरू जनता से ये महाराजे साधु संत लंबी लंबी रकमें ऐंठा करते हैं और धर्म के नाम पर जनता को उल्लू बना रहे है। ये साधु संत खुद ऐसी लकदक गाड़ियों में घूमते हैं और इनका खानपान भी ऊँचे स्तर  का होता है। कोई बादाम का हलुआ खाता है तो कोई मलमल के बिस्तर पर सोता है और देश विदेश में जनता के चंदे से हवाई यात्राएं करते हैं । आजकल के साधु - संतों के रहन सहन का स्तर राजे महाराजों से कम नहीं है इनके करोड़ों के ट्रस्ट हैं जिसके मालिक ये खुद हैं और ये चाहें तो किसी क्षेत्र को गोद  में लेकर उसका उद्धार करा सकते हैं ।

हमारे देश की जनता का दुर्भाग्य है कि देश की जनता से वोट बटोरने की राजनीति कर राजनेताओं ने और धर्म के नाम पर प्रचार प्रसार करने के नाम पर इन साधु संत राजे महाराजों ने खूब जी भर कर छला और लूटा है जिसका खामियाजा आम जनता जी भरकर भुगत रही है और खूब उल्लू बन रही है ।

@ महेन्द्र मिश्र, जबलपुर  ..

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-07-2016) को "आदमी का चमत्कार" (चर्चा अंक-2390) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Satish Saxena ने कहा…

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झुग्गी से महलों के वादे,सदियों का दस्तूर रहा
राजमहल ने मोची के भी सिक्के चलते देखे हैं

मूर्ख बना के कंगालों को,जश्न मनाते महलों ने
अक्सर ठट्ठा मार मारकर, जाम छलकते देखे हैं !

Jyoti Dehliwal ने कहा…

महेंद्र जी, यदि जनता इन राजनेताओं एवं साधुसंतों की चापुलसी करना छोड़े तो ही ये लोग सुधर सकते है। लेकिन जब जनता स्वयं ही...!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सटीक।