7.4.16

धर्म का सार पीड़ित मानवता की सेवा करना ...

एक आश्रम में गुरूजी के दो शिष्य थे और दोनों गुरूजी के साथ नदी में स्नान करने गये  ... स्नान करने के बाद दोनों शिष्य गुरूजी के साथ नदी के किनारे ध्यान करने बैठ गये ।  अचानक नदी में से एक आवाज गूंजी बचाओ बचाओ और एक शिष्य ने जैसे ही यह आवाज सुनी वह तत्काल नदी की ओर दौड़ पड़ा और उसने देखा कि एक छोटा सा बालक नदी में डूब रहा तो उसने बिना विचार किये नदी में छलांग लगा दी और उस डूबते बालक को बचा लिया ।

दूसरा शिष्य ध्यान योग करता रहा और उसने नदी की ओर से आ रही चींखों की ओर ध्यान भी नहीं दिया । इस घटना का गुरूजी ध्यान  से सूक्ष्मावलोकन  कर रहे थे ।  गुरूजी ने दूसरे शिष्य से पूछा - तुमने नदी की और से आ रही चींखों को नहीं सुना तो दूसरे शिष्य ने गुरूजी को उत्तर दिया - सुना तो था पर मैं उस समय ध्यान योग कर रहा था और ध्यान योग को मैं कैसे बीच में छोडकर उठ सकता था और गुरूजी अगर मैं उठ जाता तो मुझे ध्यान योग का कैसे लाभ मिल पाता ।

गुरूजी उसका उत्तर सुन कोर्धित हो उठे और उस शिष्य से बोले - तुमने कई वर्षों तक मुझसे कई धर्म   शास्त्रों का मुझसे ज्ञान प्राप्त किया परन्तु तुम अभी तक धर्म का सार नहीं समझ पाये  ... थोथे कर्मकांड धर्म का सार नहीं है असली धर्म का सार पीड़ित मानवता की सेवा करना हैं । आगे गुरजी ने कहा - असली धर्म का सार तुम्हारे मित्र ने समझ लिया है जिसने नदी की और से आ रही चींखों को सुनकर नदी में छलांग लगा दी और बच्चे का जीवन बचा कर उसको जीवनदान दिया है और पीड़ित मानवता की सेवा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत  किया है  ।  यह सुनकर दूसरे शिष्य की आँखे खुल गई ।

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4 टिप्‍पणियां:

महेंद्र मिश्र ने कहा…

काफी दिनों बाद आज पोस्ट लिखी है कृप्या अवलोकन कर अपने विचार करेंगें ...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (08-04-2016) को "नैनीताल के ईर्द-गिर्द भी काफी कुछ है देखने के लिये..." (चर्चा अंक-2306) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Digamber Naswa ने कहा…

अच्छी कथा ... असल सेवा असल ज्ञान तो मानवता की रक्षा है ...
नव वर्ष की शुभकामनायें ...

Kavita Rawat ने कहा…

थोथे कर्मकांड धर्म का सार नहीं है असली धर्म का सार पीड़ित मानवता की सेवा करना हैं
बिलकुल सटीक बात है। ..
बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति