19.4.16

" और छूटने लगा है लोटा " और "छूट भी नहीं रहा लोटा ..."

लोटा संस्कृति अपने देश में बहुत पुरानी है 21 वीं सदी में हम भलाई पहुँच जाएँ पर इसका मोह कभी न छोड़ सकेंगें ... लोग बाग गांवों में और स्मार्ट बनने जा रहे शहरों में लोग बाग आज भी लोटा लेकर शौच करने जाते हैं गांवों में सुबह सुबह सड़क के किनारे लोगबाग शौच करते दिखाई देते हैं ...


देश में तन से और मन से और धन से स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है और घर घर में शौचालय बनाने की बातें खूब की जा रही हैं . यदि कहीं भी शौचालय बनाये भी गए हैं तो वे व्यवस्थित नहीं हैं .. खूब प्रचार प्रसार किया जाता है और खूब रैलियां निकाली जाती हैं और इसके समर्थन में प्रिंट मीडिया के द्वारा कभी कभी लल्लू चप्पूगिरी करते हुये अधिक वाहवाही छाप दी जाती है जैसा कि मैंने आज दैनिक  जागरण के समाचार पत्र में पढ़ा कि " अब छूटने लगा है लोटा " जबकि हकीकत यह है कि " अभी भी छूट नहीं रहा लोटा " ... मैं जबलपुर जैसे शहर में प्रातः जब घूमने जाता हूँ तो मुझे कई गरीब महिलायें सड़क के किनारे शौच करती दिखाई देती हैं तब मन गहरी सोच में पड जाता है कि हम चाँद मंगल पर क्यों न पहुँच जाएँ कितना भी आधुनिक बनने का प्रयास करें और झूठा प्रसार प्रसार कर लें पर अपने देश में " लोटा एकदम नहीं छूट " सकता यह कटु सत्य है  ... टीव्ही और प्रिंट मीडिया के समाचारों पर अब भरोसा नहीं होता है ...

प्रिंट मीडिया एक जगह की केवल एक फोटो छापकर यह प्रदर्शित करने की कोशिश करता है कि जैसे ऐसी समस्या और कहीं नहीं है और थोथी वाहवाही लूटने का प्रयास करता है .. आबादी के हिसाब से देश में अभी भी काफी शौचालयों की कमी है और अभी भी इस दिशा में काफी ठोस प्रयास  की जरुरत है साथ ही लोगों को भी जागरूक किया जाना जरुरी है कि वे खुले में शौच ना जाये तभी लोटा संस्कृति में कमी आएगी ... 

4 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

यहीं राजधानी भोपाल में सरे आम दिख जाते हैं . छोटे शहर और गांव की क्या बात करें

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (20 -04-2016) को "सूखा लोगों द्वारा ही पैदा किया गया?" (चर्चा अंक-2318) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vinay Kumar Tiwari ने कहा…

यही कहानी हर जगह की है..अभी पिछले दिनों मैं गाँव गया था एक सज्जन कह रहे थे,'बताइए खुले में मैदान जाने से बेहतर घर में शौच करना कहाँ उचित है..सरकार नाहक ही प्रचार में पैसा व्यय कर रही है..'तो फिर लोटा कहाँ छुट पायेगा...

महेंद्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया चर्चा लगी काफी लिंक पढ़ने लायक हैं साथ ही समयचक्र की पोस्ट को शामिल करने के लिए आभार ...