6.4.16

ड्रिंकिंग काढ़ा ... भड़भूँजा साहित्यकार का सपना

आज ठीक सात बजे काढ़ा पीते समय सोच रहा था कि चूतिये हैं वो साहित्यकार जो दिन रात मेहनत कर लिखते रहते हैं और उम्दा साहित्य रचते हैं .. अरे मैं जो लिखता हूँ न सब चस्का मार मार कर पढ़ते हैं .. मैं सिर्फ संस्कारों को दरकिनार करते हुए लिखता हूँ ... आपको शायद पता नहीं कि मेरी रचनाएँ विदेश के लोग खूब पढ़ते हैं और इस देश के लोग साहित्यकार जाहिल काहिल हैं जो मेरी रचनाएँ नहीं पढ़ते हैं ....

जब मैं लड़की और गर्ल फ्रेंड्स के बारे में और सेक्स के बारे में लिखता हूँ तो चूतिये आज के नवजवान उससे प्रेरणा लेते हैं और आपको तो मालूम हैं कि नवजवान पीढ़ी ऐसे साहित्यों में कितनी रूचि लेती है और वे बहक जाते हैं ... मेरे ऐसे साहित्य से मेरी टीआरपी बढ़ जाती है .... मैं सेकुलर हूँ और मेरा काम ही बहकाना है और चटकीले बातों से अपनी टीआरपी को बढ़ाये रखता हूँ ...

हाँ याद आया मुक्का ... मैंने इतनी जोर से टेबिल में मुक्का मारा कि मेरी लिखा लेख और कलम और टेबिल खूब जोर से लड़खड़ा उठी जैसे साहित्य के क्षेत्र में भूकम्प आ गया हो ... जब नींद खुली तो देखा कि मैं एक सपना देख रहा था ... मैं पलंग के नीचे पड़ा था और हाथ में प्लास्टर बांधने की नौबत आ गई थी और मैं मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि हे भगवान मुझे अगले जनम में भड़भूँजा साहित्यकार न बनाना ...

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2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (08-04-2016) को "नैनीताल के ईर्द-गिर्द भी काफी कुछ है देखने के लिये..." (चर्चा अंक-2306) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

मिश्र जी ...खरी खरी ...जबरदस्त व्यंग्य ...विचारणीय
भ्रमर 5