26.6.15

चंबल के बीहड़ और पुरानी यादें ....

जब जब चंबल के बीहड़ देखता हूँ तो पुराने दिन याद आ जाते हैं जब इन बीहड़ों में और इनके आसपास के शहरों में डकैतों की भरमार थी .. 11 मार्च 1976 का  दिन मुझे मध्यप्रदेश विदयुत मंडल,ग्वालियर में  नौकरी पर अपनी उपस्थिति देना थी तो मेरे पापा मुझे बस से ग्वालियर ले गए थे .

उस समय ग्वालियर के लिए ट्रेनें नहीं चलती थी और राज्य परिवहन की लाल खटारा बसों से यात्रा करना पड़ती थी . मैं अपने पापा के साथ ग्वालियर हाई कोर्ट के पास एक थाना है वहां पहुंचा तो देखा कि एक चंबल का कुख्यात डकैत हिरोतमा मरा  पड़ा है और उसका पूरा शरीर गोलियों से छिदा है और उस मरे डाकू को चारों और बंदूकधारी पुलिसवाले उसे घेर कर खड़े हैं कि कहीं वह फिर से जिंदा न खड़ा हो जाये .

जानकारी लेने पर वहां के लोगों ने बताया कि यह चंबल का कुख्यात हिरोतमा है और लोग इसे चंबल का शेर कहते हैं . मैं तो काफी डर  गया था और मैंने अपने पापा से कहा कि मुझे यहाँ नौकरी नहीं करना है और मुझे यहाँ से तुरंत जबलपुर ले चलिए पर मेरे पापा जी ने मना कर दिया और कहा - बेटा यदि भविष्य बनाना है तो नौकरी करना पड़ेगी चाहे कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न हो रहना पडेगा और मेरे पापा मुझे ग्वालियर में छोड़कर वापिस जबलपुर लौट आये और मुझे वहां मन मसोसकर रहना पड़ा  ...

धीरे धीरे मेरा वहां मन लगने लगा और पापा की बात को मन में बैठा लिया कि जो भी हो देखा जायेगा और उस समय मेरी उम्र अठारह वर्ष एक माह की थी  … उस समय चंबल की घाटी में माधोसिंग, मूरत सिंह, पूजा बाबा, नाथू सिंह जैसे नामी डकैतों के गिरोह रहते थे और सारी घाटी में दिन रात गोलियों की धाय धाँय की आवाज गूंजा करती थी और तो और शहरों में भी डकैतों का डेरा रहता था ... ग्वालियर और आसपास के क्षेत्रों में डर दहशत का माहौल रहता था . चंबल घाटी दूर दूर तक मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में तीन राज्यों में फैली है .




डाकू एक राज्य में अपराध कर दूसरे राज्य में भाग जाते थे और उन्हें दूसरे राज्य की पुलिस पकड़ नहीं पाती थी और चंबल नदी खून से रक्तरंजित रहती थी . मैं अपने मित्रों के साथ एक बार घूमने उस घाटी में गया था काफी दुर्गम थी और वहां काफी बड़े बड़े टीले थे और मीलों गहरी लंबी खाइयां थी और ऊँची ऊंची घास की भरमार थी जिनमें आसानी से छिपा जा सकता था और कहीं भी इधर- उधर छिप कर आया जाया जा सकता था  .

करीब एक साल बाद डकैतों ने आत्म समर्पण कर दिया था और उन्हें मध्यप्रदेश में अशोकनगर के पास मुंगावली खुली जेल में स्थान दिया गया था वहां भी जाकर मुझे डकैतों को खुली जेल में देखने का मौका मिला . फिर धीरे धीरे चंबल में शांति का साम्राज्य स्थापित होने लगा  . एक्का दुक्का डकैतों के गिरोह बचे रह गए थे . राज्य सरकारों द्धारा अधिकतर बीहड़ समतल करा दिये गए हैं .

अभी पिछले दिनों फिर से बीहड़ देखने का मौका  मिला और मैंने जमकर फोटो उतारे जो यहाँ दे रहा हूँ  . जब जब इस इलाके से गुजरता हूँ अपने वे पुराने दिन याद आ जाते हैं और साथ ही पापा के वे शब्द भी याद आ जाते हैं कि जीवन में अगर कुछ करना है तो कठिनाइयों में भी रहना सीखो ....
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