7.6.14

वृंदावन के भिखारी और भिखारिनें - इनका दरद न जाने कोय

भगवान कृष्ण को अपना पति  मानकर  अपना सम्पूर्ण जीवन भगवान कृष्ण को पूर्ण रूप से समर्पित कर कई विधवा महिलायें वृंदावन में बस जाती हैं और जब तक पूर्ण रूप से स्वस्थ रहती हैं तो किसी वे किसी बड़े आश्रम को अपनी सेवायें अर्पित करती रहती हैं और ईश्वर की आराधना में लगी रहती हैं और जब वे शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाती हैं तो उन्हें वृन्दावन के बड़े बड़े आश्रमों के साधु -संत उन्हें अपने आश्रमों में जगह नहीं देते हैं और वे वृद्धावस्था में वृन्दावन की कुंज गलियों में दर दर भीख माँगने विवश हो जाती हैं ..



जब जब मैं वृंदावन भगवान के दर्शन करने जाता हूँ तो मुझे वृंदावन की गलियों, बस स्टेंड , रेलवे स्टेशन, और वृंदावन की सडकों और मंदिरों में , होटलों में भिखारी और भिखारिनें की संख्या अधिकाधिक दिखाई देती है जो भीड़ में हाथ फैलाकर सामने भीख माँगने खड़े हो जाते हैं जब मुझे इनकी यह स्थिति देख आत्यधिक दुःख होता है और मैं मन ही मन में सोचने लगता हूँ कि भगवान भी क्या इन भिखारियों के बारे में नहीं सोचते हैं और उचित न्याय नहीं करते हैं कि ये बेचारे भीख क्यों मांग रहे हैं और उनका दुःख दर्द क्यों नहीं दूर करते ...



अगर भगवान नहीं देख रहे हैं तो जीते जागते इंसान तो ये सब देख रहे हैं जो करोड़ों और अरबों रुपयों लागत से  वृन्दावन में हजारों मंदिर बनाये बैठे हैं  ... जो एक ही झटके में प्रवचन के दौरान कभी गौ सेवा के नाम पर तो कभी गोवर्धन परिक्रमा के नाम पर लाखों लाख रुपये बटोर लेते हैं और लाखों की लकदक कार में घूमते  फिरते हैं जो चाहे तो एक ही झटके में वृंदावन की भिक्षावृत्ति समस्या का समाधान कर सकते हैं और वहां के भिखारियों को अपने आश्रम में शरण दे सकते हैं  ... पर ऐसा होता कहाँ है समय बदल गया है और अब लगता है कि इंसान के साथ साथ भगवान भी स्वार्थी हो गया है कि इन बेचारों का दुःख दर्द दूर नहीं कर सकता है  ... आखिर कौन इनके दुःख दर्द को कब समझेगा  ...

कुल मिलाकर मानवीय नैतिक सोच में निरंतर गिरावट आ रही है  और अब स्वार्थ की राजनीति के चलते कोई किसी वृद्ध बीमार की सहायता करना अपना नैतिक धर्म नहीं समझता है  ... सबसे बड़ा धर्म मानवीय सेवा करना है  ...


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14 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन कब होगा इंसाफ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

आशीष भाई ने कहा…

बढ़िया व विचारणीय लेख , समाधान वो खुद हैं , एकजुट होना चाहिए व अपने अंदर की शक्ति को जगाना चाहिए , उनकी एकता की शक्ति को देखकर , हमारा पालनहार जरूर साथ देगा ! आ. महेंद्र भाई धन्यवाद !
I.A.S.I.H - ब्लॉग ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (08-06-2014) को ""मृगतृष्णा" (चर्चा मंच-1637) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

आशा जोगळेकर ने कहा…

आसीष भाई से सहमत। एकता में बडा बल है।

mahendra mishra ने कहा…

आभार शुक्रिया सर

mahendra mishra ने कहा…

शुक्रिया मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए ...

mahendra mishra ने कहा…

धन्यवाद आपके विचारों से सहमत हूँ

mahendra mishra ने कहा…

शुक्रिया आभार टीप के लिए

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

परम्परा है कि वृंदावन, बनारस में बंगालिनी वैध्वय काटने आ जाती हैं और यहाँ उनको शोषण का शिकार होना पड़ता है। दुखद स्थिति है।

mahendra mishra ने कहा…

मुझे भी कुछ कुछ यही समझ में आता है ..... आभार

कविता रावत ने कहा…

मुझको कहाँ ढूंढता है रे बन्दे! जानते-कहते हुए भी कहाँ समझ पाते हैं दीन हीन को। ।
वास्तव में ईश्वर को ढूंढने के फेर में हम सब यह सब देख ही नहीं पाते! इसके लिए अलग से ऑंखें चाहिए होती हैं ..........
... संवेदनशील चिंतन भरी प्रस्तुति

mahendra mishra ने कहा…

टीप के लिए आभार कविता जी

Digamber Naswa ने कहा…

दयनीय स्तिथि में रहती हैं वो बेचारियाँ ... अफ़सोस की बात है की मानव सेवा का अर्थ कोई नहीं समझ पाता ऐसे स्थानों में भी ...

mahendra mishra ने कहा…

शुक्रिया आभार टीप के लिए