29.1.11

चाणक्य जैसे लोकसेवी और सृजन शिल्पी की देश को जरुरत है ...

हमारे देश में चाणक्य राष्ट्रनीति के संचालक और कूटनीतिज्ञ और विद्वान थे . उनकी कूटनीति और सादगी की चर्चा सारे विश्व में होती थी . यूनान के राजदूत ने भी उनकी विद्वता के बारे में सुना था और वह उनसे मिलने निकल पड़ा . खोजते खोजते वह गंगा के तट पर पहुँच गया . एक राहगीर ने उन्हें उनके घर का पता बताया . राजदूत ने देखा की चाणक्य की कुटिया घास फूस से निर्मित थी . उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ की भारत के प्रधानमंत्री का घर क्या घास फूस का हो सकता है .

वह कुटिया के सामने पहुंचा तो उसने देखा की कुटिया के दरवाजे खुले थे . एक कमरे में एक सांवला आदमी मंद मंद दीपक की रोशनी में कलम से कुछ लिख रहा था . राजदूत ने उस आदमी से कहा - मुझे प्रधानमंत्री चाणक्य से मिलना है . राजदूत की आवाज सुनकर उस आदमी ने अपनी लेखनी रख दी और टिमटिमाता एक दीपक बुझा दिया और दूसरा दीपक जलाकर शालीन शब्दों में कहा - आपका स्वागत है अतिथि मुझे ही चाणक्य कहते हैं . यह सुनकर और देखकर राजदूत दंग रह गया की साधारण सी धोती पहिने और एक लंबी चोटी रखा आदमी क्या किसी देश का प्रधानमंत्री भी हो सकता है . जी हुजूरी करने वाले नौकरों का उस कमरे में नामोनिशान तक नहीं था और वहां बैठने के लिए फर्नीचर तक नहीं था . राजदूत ने चाणक्य से दीपक जलाने और बुझाने का रहस्य उनसे पूछा तो चाणक्य ने उत्तर दिया - पहले वाले दीपक में राजकोष का तेल था और दूसरे वाले दीपक में उनकी आय से अर्जित ख़रीदा गया तेल है . राजदूत ने उनसे पूछा की आपकी आय का श्रोत क्या है .

चाणक्य ने उसे बताया की पुस्तकों को लिखने और और छात्रों को पढ़ाने से जो आय हो जाती है उसमे से गुजारे लायक लेता हूँ और शेष बची राशि गरीब निर्धन छात्रों के लिए खर्च कर देता हूँ . राजदूत ने सुनकर आश्चर्य से कहा - अर्थात आप अपने गुजारे के लिए राजकोष पर भी निर्भर नहीं है . आचार्य चाणक्य ने राजदूत से कहा - आपकी और कोई जिज्ञासा हो तो बताइये . राजदूत ने चरणों को नमन कर कहा - अब मेरी कोई जिज्ञासा नहीं हैं आपकी जीवन प्रणाली ने मेरी सारी जिज्ञासाएं शमन कर दी है आपसे मिलकर मैं धन्य हुआ .

राजदूत जब अपने देश लौटा और उसने अपनी पुस्तक में लिखा की मुझे भारत में अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्र निर्माण करने का रहस्य मिला . सादगी और संयम जिसके जीवन के अविभाज्य अंग हों वह राष्ट्रनिर्माता बन सकता है . ऐसे राष्ट्रनिर्माताओं की दम पर देश और समाज उन्नति कर सकता है . ऐसे ही राष्ट्रनिर्माता चाणक्य जैसे लोकसेवी और सृजन शिल्पी की आज के परिपेक्ष्य में देश को नितांत आवश्यकता है और ऐसे राष्ट्रसेवी गढ़ना होंगें ... जो अतीत का गौरव स्थापित कर सके जिससे देश और समाज उन्नति कर सकें .

0000000

23 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

ab to dikhawa hi rah gaya hai..

राज भाटिय़ा ने कहा…

्बहुत सुंदर जी

: केवल राम : ने कहा…

चाणक्य एक आदर्श स्थापित करता है ..हमारे सामने ..पर आज कौन सोचता है इस तरफ ....आपका आभार

Kajal Kumar ने कहा…

यह केवल आत्मचिंतन से ही संभव है, बहुत कठिन आज इस बात को वर्ना सिखा पाना.

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

@काजल कुमार जी
आपके विचारों से सहमत हूँ की महापुरुषों के आदर्शों को ध्यान में रखकर ही यह केवल आत्मचिंतन से ही संभव है ..आभार

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जो राजसत्ता में लिप्त हों, वो तो उसे सुधारने से रहे।

Deepak Saini ने कहा…

चाणक्य जैसे तो अब भारत मे पैदा होना ही बंद हो गये है
हाँ एक थे जिनके गुण चाणक्य से मिलते थे और वे थे भारत के लाल, लाल बहादुर शास्त्री,
उनके बाद तो बस राजकोष को लूटने वाले तो आये परन्तु बचाने वाला वाले नही,
लेख को पढकर अनायास ही शास्त्री जी तस्वीर दिमाग मे घूम गयी,
बहुत अच्छा लेख
आभार

मनोज कुमार ने कहा…

सही कहा आपने कि ऐसे राष्ट्रसेवी गढ़ना होंगें ... जो अतीत का गौरव स्थापित कर सके जिससे देश और समाज उन्नति कर सकें .

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

मुझे तो यह कथा ही बनावटी लगती है। उन की पुस्तकों से उन का ऐसा चरित्र सामने नहीं आता।
यदि वे महामंत्री थे तो निश्चय ही वे राजप्रासाद के निकट ही कहीं रहते होंगे। यदि वे शिश्यों को पढ़ा रहे होंगे तो उन का घर गुरुकुल जैसा रहा होगा। अकेले गंगा किनारे राजकीय तेल की बाती में राजकीय कार्य करने की कोई तुक नहीं लगती। यदि वे राजकीय कार्य के लिए अलग बाती जलाते थे फिर उस कार्य के लिए तमाम राजकीय सुविधाएँ भी उपयोग कर सकते थे। अनेक बातें हैं। अक्सर महान लोगों के पीछे अनेक गढ़े हुए किस्से भी होते हैं।

Ashish Shrivastava ने कहा…

दिनेश जी से सहमत ! यह किस्सा मैंने किसी खलीफा के नाम से पढ़ा है !

चाणक्य एक शिक्षक थे, जब तक वे गुरुकुल में थे, भीक्षा के अन्न से गुजारा करते थे ! शिक्षक ही नहीं सारा गुरुकुल भिक्षा के अन्न से गुजारा करता था ! जब में मंत्री बने, चाणक्य नीती के अनुसार उन्हें राज्य वृत्ती (वेतन) देता होगा !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

आवश्यकता आविष्कार की जननी है!
हमारे यहाँ तो सियासती चाणक्यों की भरमार है!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सत्ता लोलुप लोगों से क्या उम्मीद करें.... सार्थक आलेख

Coral ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आपने पर अब सब दिखावा रहा गया है .... उन सिधान्तो का ढोल तो बजाते फिरेंगे पर अमल करना उनके लिए बहुत मुश्किल है !

समय ने कहा…

अतीत की निर्मम समालोचना की रौशनाई में वर्तमान का सही विश्लेषण बेहतर भविष्य की राह निकालेगा।

व्यक्ति आधारित आदर्श नहीं, वस्तुगत सामाजिक परिस्थितियां और उनमें आमूलचूल बदलाव समग्र-समाज को राह देते हैं।

शुक्रिया।

अजय कुमार ने कहा…

ऐसे राष्ट्रपुरुष तो इतिहास के पन्नों में रह गये हैं,कभी कभी आप जैसे सुधी लोग ब्लाग पर ले आते हैं , आभार

GirishMukul ने कहा…

Are bap re mujhe is chankay ke is se pahaloo kee jaanakaaree n thee. jabaki kai bar unake vicharon ko kot kiya.
wah aabhar bookmark karane layak post hai
sadar
girish billore

ZEAL ने कहा…

कुछ लोग आज भी इन सिद्धांतों का पालन कर रहे हैं।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

sachmuch ab aisa koi chaahiye hee jo aisa udaaharn samne laakar sab ko prerit kar sake warna chanky ke banaye is desh ko aaj chanky bechne par tule hue hain

S.M.HABIB ने कहा…

सत्याभिव्यक्ति....

दीपक बाबा ने कहा…

सहमत.......

ManPreet Kaur ने कहा…

very nice..
Pls Visit My Blog..

Lyrics Mantra
Download Free Latest Bollywood Music
Real Ghost and Paranormal

Rahul Singh ने कहा…

प्रेरक और अनुकरणीय.

Vivek Kumar ने कहा…

bhai wo congressi nahi the..