27.9.10

परमार्थ करने वालों के पास संसाधनों की कमी नहीं होती ...

" रघुकुल रीति सदा चलि आई पर प्राण जाएँ पर वचन न जाई ..." यह उक्ति रघुकुल के बारे में कही जाती है . रघु भी उसी कुल के पुरोधा थे और वे बड़े दानी थे . एक बार राजन रघु ने सर्वमेघ यज्ञ किया . उनके पास जो भी धन सम्पदा थी उन्होंने गरीबों को दान कर और उनके पास सम्पदा के नाम पर मात्र एक मिटटी का घड़ा और एक मिटटी का जलपात्र था . पहिनने के लिए उनके पास मात्र एक धोती बची थी और वे कुश के बिस्तर पर सोते थे . कौत्स नाम के एक साधु महात्मा थे . काफी समय बाद कौत्स को पता चला की राजन रघु ने यज्ञ किया है और अपनी संपत्ति गरीबों को दान कर रहे हैं तो उन साधु के मन भी दान प्राप्त करने का विचार आया और वे सोचने लगे की यदि उन्हें भी कुछ दान दक्षिणा मिल जाए तो वे अपने गुरु की दक्षिणा चुका देंगे .

यह विचार कर वे धन की याचना करने राजा रघु के पास पहुँच गए और रघु से दान देने हेतु याचना करने लगे . उस समय राजन रघु के पास दान देने के लिए कुछ भी नहीं बचा था . जब कौत्स मुनि ने यह सब देखा की राजा के पास दान देने के लिए कुछ भी नहीं बचा है तो वे निराश होकर वहां से वापिस लौट पड़े . कुछ समय के पश्चात राजा को यह जानकारी मिली की कोई साधु उनसे दान मांगने आये थे तो तुरंत उन्होंने कौत्स साधु को अपने पास बुलवा लिया .

राजा रघु ने कहा - आप यही रहे तबतक धन की व्यवस्था हो जायेगी और राजा रघु लक्ष्मी जी की आराधना करने लगे की . भगवती लक्ष्मी जी ने रघु की परमार्थ कामना को समझा और राजा के राजकोष को स्वर्ण और अथाह संपत्ति से लबालब कर दिया . राजन रघु ने साधु कौत्स को काफी दान दक्षिणा देकर उन्हें बिदा किया .

साधु कौत्स ने चकित होकर भगवती लक्ष्मी से पूछा - माता आपने राजा की तनिक सी याचना पर उन्हें कैसे विपुल उपहार दे दिया . कृपया मेरे प्रश्न का निराकरण करने की कृपा करें . भगवती लक्ष्मी जी ने साधु कौत्स से कहा - मुनिवर जो धर्म के प्रति आस्थावान होते है और परमार्थ के निमित्त कार्य करते हैं, कभी उन्हें मैं आपने संसाधनों से वंचित नहीं करती हूँ और यह मेरा सनातन का नियम है .

असल में उपरोक्त कथा हम सब के लिए एक सन्देश है की श्रमशील, धर्मपरायण और परमार्थी के पास ही लक्ष्मी का निवास होता है और वे इन्हीं के पास रहना पसंद करती हैं .

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18 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

ज्ञानपरक कथा !

वन्दना ने कहा…

लक्ष्मी का वहीं निवास होता है जो उसका सदुपयोग करता है………………बहुत बढिया कथा।

BrijmohanShrivastava ने कहा…

बहुत ही ज्ञान बर्धक और शिक्षा प्रद कथा
بحت هي جين فرضك كذا

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर कथा जी धन्यवाद

DEEPAK BABA ने कहा…

ज्ञानवर्धक को अनुकरणीय...........


जब पैसे नहीं होते और किसी कि पेमेंट का दिन आ जाता है - उस दिन लक्ष्मी माता कृपा करती हैं और पैसे आ जाते हैं - प्रभु जी इज्ज़त रख लेते हैं.

मिश्र जी हमने तो ऐसी जिदगी जी हुई है - और जी रहे हैं.

आभार - मोरल सपोर्ट के लिए.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रेरणादायक कथा।

संगीता पुरी ने कहा…

प्रेरणादायी प्रसंग !!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बढ़िया प्रसंग मिस्र जी ।

शिवम् मिश्रा ने कहा…


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

Babli ने कहा…

आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
बहुत बढ़िया, ज्ञानबर्धक और प्रेरणादायक कथा!

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

आज भी यह सत्य है .

सत्यप्रकाश पाण्डेय ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

यहाँ भी पधारें:-
ईदगाह कहानी समीक्षा

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत ही उपयोगी रही यह कथा!

शरद कोकास ने कहा…

अच्छी कथा है मिश्र जी ।

shikha varshney ने कहा…

शिक्षाप्रद कथा .

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
काव्य प्रयोजन (भाग-१०), मार्क्सवादी चिंतन, मनोज कुमार की प्रस्तुति, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

JHAROKHA ने कहा…

ekdam sateek baat kahi hai aapne is prerak kath ke saath .bahut hi bhav pravan post.
poonam

शिक्षामित्र ने कहा…

सही कह रहे हैं। आध्यात्मिक पुरूषों के जीवन की कई घटनाएं इसकी पुष्टि करती हैं।