24.9.10

परहित सरिस धर्म नहिं भाई ...

रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने लिखा है ...." परहित सरिस धर्म नहिं भाई " .. "पर पीड़ा सम नहिं अधमाई " जिसका भावार्थ यह है की दूसरों का हित (भलाई) करने से बड़ा धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुंचाने के सामान कोई पाप नहीं है . मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है मनुष्यता का होना है . व्यक्ति की धन्यता और पवित्रता सर्व जन हिताय कार्यों में संलग्न होने में ही होती है . दूसरों की भलाई करना ही सबसे बड़ा धर्म है .

ज्योति मठ के शंकराचार्य के एक परम शिष्य थे उनका नाम कृष्ण बोधाश्रम था जोकि १२० वर्ष तक जीवित थे . कृष्ण बोधाश्रम एक बार प्रवास पर थे और वे घूमते घूमते एक जगह पर गए जहाँ पर करीब पांच वर्षों से बारिश नहीं हुई थी और उस इलाके के सारे तालाब और कुंए सूख गए थे . उस इलाके के लोगों को और उनके जानवरों को पीने को पानी नहीं मिलता था .

उस इलाके के सारे लोग कृष्ण बोधाश्रम जी के पास पहुंचे और अनुनय विनय कर बोले महाराज जी इस दुविधा से निपटने के लिए कोई उपाय बताएं .. कृष्ण बोधाश्रम जी ने मुस्कुराकर कहा - पुण्य होंगें तो भगवान भी प्रसन्न हो जाते हैं . गाँव वालो ने कहा - स्वामी जी हम लोग क्या पुण्य करें हमें तो कुछ आता नहीं है कृपा कर आप ही बताये .

कृष्ण बोधाश्रम जी ने कहा - सामने जो तालाब दिख रहा है और उस तालाब में पानी भी नहीं है जिसके कारण उस तालाब की मछलियाँ प्यास से मर रही हैं . तुम लोग उस तालाब में पानी डालो और प्यास से मर रही मछलियों को जिन्दा बचा लो .

गाँव वालों ने कहा - स्वामीजी हम लोगों को पीने को पानी नहीं है उन मछलियों के लिए हम कहाँ से पानी लायें . स्वामी कृष्ण बोधाश्रम जी वहां उपस्थित लोगों से कहा - कहीं दूर से भी पानी लाओ और उस तालाब में डालो . सभी लोगों ने दूर दराज क्षेत्रों से पानी लाकर उस तालाब में डालना शुरू कर दिया .

दूसरे दिन घनघोर बारिश शुरू हो गई और लगातार बारिश होने से उस क्षेत्र में दुर्भिक्ष की जो स्थिति थी वह समाप्त हो गई थी और उस इलाके में भरपूर पानी हो गया . परहित सरिस धर्म नहिं भाई ... दूसरों का हित करने के लिए तत्पर रहें जो र्म से भी बढ़कर हैं . परोपकार करने से मनुष्य को चमत्कारी पुण्य लाभ अर्जित होते हैं . ईश्वर ने केवल मनुष्य को ही ऐसी बुद्धि प्रदान की है की वह अपना और दूसरों का दुःख संपादन कर सकता है अतएव मानव शरीर प्राप्त कर सबका हित साधन और हित चिंतन करना ही सबसे बड़ा धर्म है .

00000

23 टिप्‍पणियां:

DEEPAK BABA ने कहा…

प्रेरणा दायक प्रसंग............ साधुवाद पंडितजी,

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सुंदर आलेख, शुभकामनाएं.

रामराम.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत अच्छी सीख और कथा के माध्यम से समझाने का सार्थक प्रयास ..

मनोज कुमार ने कहा…

आपका आलेख गहरे विचारों से परिपूर्ण होता है।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर लेख,धन्यवाद

AlbelaKhatri.com ने कहा…

बहुत उत्तम बात...........

उम्दा पोस्ट !

M VERMA ने कहा…

प्रेरक प्रसंग

राजभाषा हिंदी ने कहा…

हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता। यदि हम ये भाव मन में लाएं कि “ये न सोचें मिला क्या है हमको, हम ये सोचें किया क्या है अर्पण, बांटें ख़ुशियां सभी को हम तो, सबका जीवन ही बन जाएं मधुवन!” आदरणीय मिश्र जी यह रचना हमें नवचेतना प्रदान करती है और नकारात्मक सोच से दूर सकारात्मक सोच के क़रीब ले जाती है।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-बाबा नागार्जुन, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

महेन्द्र भाई, बहुत कायदे की बात बताई।
पर पता नहीं क्यों यह बात, मानव के समझ नहीं आई।
--------
प्यार का तावीज..
सर्प दंश से कैसे बचा जा सकता है?

वन्दना ने कहा…

प्रेरणादायी प्रसंग्…………………आभार्।

ZEAL ने कहा…

.

परहित सरिस धर्म नहिं भाई ... दूसरों का हित करने के लिए तत्पर रहें जो र्म से भी बढ़कर हैं . परोपकार करने से मनुष्य को चमत्कारी पुण्य लाभ अर्जित होते हैं . ईश्वर ने केवल मनुष्य को ही ऐसी बुद्धि प्रदान की है की वह अपना और दूसरों का दुःख संपादन कर सकता है अतएव मानव शरीर प्राप्त कर सबका हित साधन और
हित चिंतन करना ही सबसे बड़ा धर्म है .

kaash sabhi samajh paate is baat ko , to raam-rajya ho jata.

.

अजय कुमार ने कहा…

प्रेरणा दायक प्रसंग

अमित शर्मा ने कहा…

प्रेरणा दायक प्रसंग

सुनीता शानू ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने महेंद्र जी। परोपकार से बड़ा कोई धर्म नही है।

mahendra verma ने कहा…

प्रेरक कथा के माध्यम से मानव जाति के लिए अच्छा संदेश।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़ी सार्थक कथा।

Archana ने कहा…

आपकी अनुमति हो तो पॉड्कास्ट बनाना चाहूँगी इस पोस्ट का...आभार सीख देती रचना के लिए..

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

अर्चना जी,
सादर अभिवादन
अच्छे विचारों को सबके सामने लाने के लिए आपके द्वारा जो प्रयास किये जा रहे हैं ...सराहनीय है... आप इस ब्लॉग से जो भी पोस्टें पॉड्कास्ट के लिए चाहे ले सकती हैं ... मेरी और से आपको पूर्ण स्वीकृति है ...

महेंद्र मिश्र

Razi Shahab ने कहा…

अच्छी पोस्ट के लिए शुक्रिया......

दीपक 'मशाल' ने कहा…

बहुत अच्छी सीख दी सर..
जन्मदिन पर आपकी शुभकामनाओं ने मेरा हौसला भी बढाया और यकीं भी दिलाया कि मैं कुछ अच्छा कर सकता हूँ.. ऐसे ही स्नेह बनाये रखें..

VIJAY TIWARI 'KISLAY' ने कहा…

अच्छे विचारों के संकलन को पाठकों के सामने लाने के लिए साधुवाद .
- विजय

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

बहुत सुंदर लेख....
आभार !!

सतीश सक्सेना ने कहा…

अच्छी शिक्षाप्रद रचना के लिए शुभकामनायें पंडित जी !