एक बार एक संत महापुरुष अपने शिष्यों के साथ कुम्भ मेले में स्नान करने गए वहां पहुँच कर उन्होंने देखा की मेले में तरह तरह के साधु संत पहुंचे थे . उन्होंने ध्यान से देखा की साधु अपने सामने एक चादर बिछाकर बैठा था और अपनी ऑंखें बंद कर माला फेर रहा था बीच बीच में वह अपनी ऑंखें खोलकर यह देख लेता था की उसे अभी तक कितना दान मिल गया है . यह सब देखकर संत जी मुस्कुरा पड़े और थोड़ी दूर वह आगे बढे तो उन्होंने देखा एक साधु एक हाथ ऊपर उठाकर अपनी एक टांग के बल पर खड़ा है और उसने अपने सामने कुछ पैसे भी फैलाकर डाल रखें हैं तो उन्हें फिर से हंसी आ गई .
एक जगह उन्होंने देखा की भागवत कथा चल रही है और चीर हरण का प्रसंग खूब रस ले लेकर सुनाया जा रहा है और उनके चेले गाँजे के नशे में धुत्त होकर हा हा ही ही कर रहे हैं . मेले में एक टेंट देखा वहां रोगियों की भारी भीड़ जमा थी और वहां उपचार करने के लिए एक मात्र चिकित्सक उपस्थित था और वह भारी भीड़ को देखकर भी विचलित हुए वगैर पूर्ण मनोभाव से एक एक रोगी का उपचार कर रहा था और सारे दिन वह रोगियों का उपचार कर रहा था यह सब देख कर संत महापुरुष की आँखों में आंसू आ गए .
संत जी से उनके शिष्यों ने पूछा की आप पहले साधुओं को देख कर हँसे थे फिर भागवत कथा सुनकर हँसे थे और बाद में आपकी आँखों में आंसू क्यों आ गए थे ? . शिष्यों पहली बार मैं इसीलिए हंसा था की मेले में कुछ लोग धर्म के नाम पर ढोंग कर रहे थे और कथा और योग के नाम पर व्यवसाय कर रहे थे परन्तु मेले में ईश्वर के नाम पर लोगों की सच्ची मानव सेवा करने वाला वह चिकित्सक था जिसे देख कर मेरी आँखों में आंसू आ गए थे जो तन मन से रोगियों का उपचार कर रहा था . सच्चा धर्म संसार और मानव की सेवा करना है . सच्चा धर्म वह है जो लोगों के पतनोन्मुख विचारों को बदल सकें .
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समयचक्र
7.2.12
सच्चा धर्म मानवता की सेवा करना है ...
31.12.11
जा रहा है बचपन आ रहा पचपन ....
सुबह सुबह अच्छी खासी नींद लगी थी की बच्चों का शोरगुल सुना तो नींद खुल गई . कमरे से बाहर निकल कर देखा की परिवार के बच्चे कह रहे थे आज इकतीस दिसंबर है और कल एक जनवरी है अच्छी खासी पार्टी का जुगाड़ होगा . केक तो कटवा के रहेंगें चाहे कुछ भी हो अपने दादा (परिवार के बच्चे अब मुझे दादा संबोधित करते हैं) अब पचपन की और जा रहे हैं . पचपन की बात सुनकर मेरे तो कान खड़े हो गए और मुझसे रहा न गया .
मुस्कुराकर मैंने बच्चों से पूछा - क्या बात है क्या पार्टी सार्टी का जुगाड़ हो रहा है . एक छोटा सी बालिका जिससे रहा न गया तड से बोली - ताऊ कल आपकी जेब काटने की तैयारी चल रही है कल आपका एक जनवरी जन्मदिन जो है . कल एक जनवरी को मेरा जन्मदिन है . ५४ वर्ष की आयु पूर्ण कर मैं पचपनवे वर्ष में प्रवेश कर रहा हूँ . जितना उल्लास और उमंगें बचपन में जन्मदिन को लेकर रहता था अब वैसा उत्साह जन्मदिन मनाने के लिए नहीं रहता हैं .
जब तक माता पिता साथ रहते हैं तब तक जन्मदिन मनाने का अंदाज और उत्साह कुछ अलग ही होता है . हमेशा मेरे माता और पिता मेरे जन्मदिन को लेकर काफी खुश रहते थे और परिवार में मेरे जन्मदिन के अवसर पर रामायण पाठ आदि के कार्यक्रम आयोजित किये जाते थे . आयु बढ़ने के साथ साथ पारिवारिक जिम्मेदारी बढ़ती ही जाती हैं . बचपन से अब पचपन की ओर बढ़ने से निश्चय ही पारिवारिक जिम्मेदारी भी बढ़ेगी और मुझे अपने दायित्वों का निर्वहन करना ही पड़ेगा जैसा की सभी के साथ होता है .
ईश्वर की कृपा से सब बढ़िया चल रहा है . बालक सर्विस में है . श्रीमतीजी भी सेवारत हैं . मुझे कोई रोग शोक नहीं है . जीवन में कुछ नया करने की सोच लेकर दो वर्ष पूर्व सेवानिवृत्ति ले ली थी और पल पल जीवन आनंद से गुजर रहा है . बस इतनी चाहत रहती है की सब खुश रहे और आनंद मय जीवन व्यतीत करें . वास्तव में बचपन की आयु के और पचपन की आयु के अनुभवों में खासा अंतर तो होता ही है बस इन दौरों के अनुभवों को अपने अपने ढंग से खुश होकर ही जीना ही असल जिंदगी को जीना है एसा मैं भी अनुभव कर रहा हूँ .
कल एक जनवरी है और नव वर्ष के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई . आपका जीवन मंगलमय हो .
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मुस्कुराकर मैंने बच्चों से पूछा - क्या बात है क्या पार्टी सार्टी का जुगाड़ हो रहा है . एक छोटा सी बालिका जिससे रहा न गया तड से बोली - ताऊ कल आपकी जेब काटने की तैयारी चल रही है कल आपका एक जनवरी जन्मदिन जो है . कल एक जनवरी को मेरा जन्मदिन है . ५४ वर्ष की आयु पूर्ण कर मैं पचपनवे वर्ष में प्रवेश कर रहा हूँ . जितना उल्लास और उमंगें बचपन में जन्मदिन को लेकर रहता था अब वैसा उत्साह जन्मदिन मनाने के लिए नहीं रहता हैं .
जब तक माता पिता साथ रहते हैं तब तक जन्मदिन मनाने का अंदाज और उत्साह कुछ अलग ही होता है . हमेशा मेरे माता और पिता मेरे जन्मदिन को लेकर काफी खुश रहते थे और परिवार में मेरे जन्मदिन के अवसर पर रामायण पाठ आदि के कार्यक्रम आयोजित किये जाते थे . आयु बढ़ने के साथ साथ पारिवारिक जिम्मेदारी बढ़ती ही जाती हैं . बचपन से अब पचपन की ओर बढ़ने से निश्चय ही पारिवारिक जिम्मेदारी भी बढ़ेगी और मुझे अपने दायित्वों का निर्वहन करना ही पड़ेगा जैसा की सभी के साथ होता है .
ईश्वर की कृपा से सब बढ़िया चल रहा है . बालक सर्विस में है . श्रीमतीजी भी सेवारत हैं . मुझे कोई रोग शोक नहीं है . जीवन में कुछ नया करने की सोच लेकर दो वर्ष पूर्व सेवानिवृत्ति ले ली थी और पल पल जीवन आनंद से गुजर रहा है . बस इतनी चाहत रहती है की सब खुश रहे और आनंद मय जीवन व्यतीत करें . वास्तव में बचपन की आयु के और पचपन की आयु के अनुभवों में खासा अंतर तो होता ही है बस इन दौरों के अनुभवों को अपने अपने ढंग से खुश होकर ही जीना ही असल जिंदगी को जीना है एसा मैं भी अनुभव कर रहा हूँ .
कल एक जनवरी है और नव वर्ष के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई . आपका जीवन मंगलमय हो .
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20.12.11
पराश्रित होना पाप है....
डाक्टर जमुना प्रसाद बड़ेरिया जी (सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर} की एक प्रेरक रचना " पराश्रित होना पाप है...." प्रस्तुत है ...
पराश्रित होना पाप है....
पराश्रित होने पर मानव को, खोना पड़ता निज सम्मान
औरो की अनुकंपा पर निर्भर, रहते सदा दुखी हैरान .
दबाकर आत्मा की आवाज , करने पड़ते अनुचित काम
जिनकी दया-कृपा पाने को, रहते हैं नित बने गुलाम.
लेना दान, शर्म की बात, पराश्रित होना भी है पाप
भीख से सुख मिलना तो दूर, उन्हें मिलता केवल संताप .
आत्म निर्भरता गौरव हेतु, न ताकें कभी पराया मुख
परम पिता की तुम संतान , सोचकर कम होता हैं दुःख .
मानव हो तुम, श्वान नहीं, जो टुकड़ा पाकर पूंछ हिलाते
तुम तो हो सामर्थ्यवान , जो श्रम करके सब कुछ पा जाते .
होकर शेरों की संतान, न शोभा देता है मिमियाना
स्वाभिमान रख करके अपनी, मंजिल खुद ही आप बनाना .
मिली अपरिमित शक्ति तुम्हें, स्थिति समक्ष प्रतिकूल तुम्हारें
आश्रय लेने यदि बाध्य करे, तो त्यागो जल्दी उसके द्वारे .
रचियता -
डाक्टर जमुना प्रसाद बड़ेरिया
ऋषि-चिंतन पीयूष से साभार .
पराश्रित होना पाप है....
पराश्रित होने पर मानव को, खोना पड़ता निज सम्मान
औरो की अनुकंपा पर निर्भर, रहते सदा दुखी हैरान .
दबाकर आत्मा की आवाज , करने पड़ते अनुचित काम
जिनकी दया-कृपा पाने को, रहते हैं नित बने गुलाम.
लेना दान, शर्म की बात, पराश्रित होना भी है पाप
भीख से सुख मिलना तो दूर, उन्हें मिलता केवल संताप .
आत्म निर्भरता गौरव हेतु, न ताकें कभी पराया मुख
परम पिता की तुम संतान , सोचकर कम होता हैं दुःख .
मानव हो तुम, श्वान नहीं, जो टुकड़ा पाकर पूंछ हिलाते
तुम तो हो सामर्थ्यवान , जो श्रम करके सब कुछ पा जाते .
होकर शेरों की संतान, न शोभा देता है मिमियाना
स्वाभिमान रख करके अपनी, मंजिल खुद ही आप बनाना .
मिली अपरिमित शक्ति तुम्हें, स्थिति समक्ष प्रतिकूल तुम्हारें
आश्रय लेने यदि बाध्य करे, तो त्यागो जल्दी उसके द्वारे .
रचियता -
डाक्टर जमुना प्रसाद बड़ेरिया
ऋषि-चिंतन पीयूष से साभार .
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