5.3.12

व्यक्तित्व की परख उसकी आदर्शनिष्ठां और उसके सिद्धांतों से की जाती है ...

जिस वातावरण में हम सब रहते हैं उसमें पतन मार्ग की और अग्रसर करने वाले तत्वों की भरमार है . आदमी इन्हीं तत्वों के प्रवाह में बहते और अपना जीवन काटते रहते हैं . कई मनुष्यों के न तो कोई आदर्श होते हैं और वे जीवनपर्यन्त कोई भी महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम नहीं दे पाते हैं . अधिकतर लोग बाग़ लोभ मोह का लाभ अपने स्वार्थों के लिए उठाते देखे जा सकते हैं .

समाज में इसे कुछ व्यक्ति भी होते हैं जो हर हाल में अपनी आदर्श निष्ठां और अपने सिद्धांतों को जिन्दा बनाये रखते हैं और विपरीत परिस्थितियां भी उन्हें विचलित नहीं कर पाती हैं . सिद्धांतों और आदर्शों की बड़ी बड़ी बाते की जाती हैं पर इन बातों को अपने जीवन में उतार पाना बड़ा ही दुरूह कार्य है . आदमी के व्यक्तित्व की असली परख लोभ मोह के अवसरों पर की जाती है .

कुछ ऐसे महान व्यक्तियों के उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ जिन्होने अपने आदर्शों और सिद्धांतों के रक्षा करने के लिए अपना जीवन सर्वस्य समर्पित कर दिया . अंग्रेजी शासन काल में अंग्रेज जबरन अपनी संस्कृति हमारे देश के लोगों पर थोपने के लिए पुरजोर कोशिश करते रहते थे . वे भारतीयों को तरह तरह के प्रलोभन देते रहते थे . उनके शासन में कर्मचारियों को अंग्रेजी पोशाक पहिनना अनिवार्य था . सर आशुतोष मुखर्जी हमेशा भारतीय पोशाक धोती और कुरता पहिना करते थे . अंग्रेज हमेशा उन पर अंग्रेजी पोशाक पहिनने हेतु दबाब डाला करते थे .

एक बारे एक अंग्रेज आफीसर ने उन्हें प्रलोभन दिया की यदि वे अंग्रेजी पोशाक पहिनना शुरू कर दें तो उन्हें पदोन्नत कर दिया जावेगा परन्तु सर आशुतोष जी ने साहसपूर्वक उस अंग्रेज के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और कहा की वे पद और पैसे के लिए अपना जातीय स्वाभिमान का परित्याग नहीं कर सकते हैं और उन्होंने सोचा की इस बात को लेकर हमेशा उनके ऊपर दबाब बनाया जायेगा इसीलिए उन्होंने सरकारी नौकरी को ठोकर मार दी और तन मन से स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े .

हमारे देश में उन दिनों महामना मालवीय जी की लेखनी की बड़ी चर्चा थी . उस समय कांकर के राजा ने हिन्दुस्तान नामक समाचार पत्र प्रारंभ किया और राजा ने महामना मालवीय जी को पत्र के संपादन के संपादक नियुक्त किया . कहा जाता है की वह राजा खूब शराब पीता था इसीलिए नियुक्ति के पूर्व महामना मालवीय जी ने उस राजा से यह शर्त रखी थी की वह शराब पीकर कभी उनके कक्ष में न आये अन्यथा वे संपादक का कार्य त्याग देंगें . नशा का अभ्यस्त होने के कारण वह राजा महामना मालवीय जी बात नहीं रख सका और यह सब देख कर मालवीय ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया .

एक बार पंडित नेहरू जी को विचलित करने हेतु अंग्रेजों ने एक चाल चली . उन्होंने पंडित नेहरू जी से कहा के वे देश की राजनीति में भाग लेना छोड़ दें तो उन्हें हमेशा के लिए जेल से आजाद कर दिया जावेगा . उन दिनों श्रीमती कमला देवी जी को क्षय रोग था उनकी देख भाल करने के लिए उनकी जरुरत थी . उस समय स्वतंत्रता आन्दोलन तीव्र गति से चल रहा था . पंडित जी बनारस जेल में थे . नेहरू जी के लिए यह परीक्षा की घडी थी . एक और उनकी पत्नी बीमार थी थी तो दूसरी और उनका देश प्रेम था . उन्होंने अपनी पत्नी से खुद जेल में आकर मिलने को कहा .

जेल में श्रीमती कमला नेहरू जी ने अश्रुपूरित सजल होकर नेहरूजी से कहा की वे राजनीति में बने रहें और इस समय देश को आपकी जरुरत है इस नश्वर शरीर की देख रेख करने के लिए आप राष्ट्रिय हितों का परित्याग न करें यही मेरी विनती है . अपनी पत्नी से प्रेरणा पाकर पंडित नेहरू जी ने अंग्रेजों का प्रस्ताव स्वीकार न करने का निर्णय लिया . दिनोदिन श्रीमती कमला का स्वास्थ्य खराब होता चला गया और उनका स्वर्गवास हो गया परन्तु पंडित जी की देशप्रेम की आस्था अडिग रही .

राजा राममोहनराय बड़े ही साहसी व्यक्ति थे उन्होंने पारिवारिक विरोध मोल लेकर अविवेकी मान्यताओं का डटकर विरोध किया . उनके पिता अत्यंत रुढ़िवादी थे . राजा राममोहनराय ने सतीप्रथा, विधवा विवाह निषेध के विरोध में निरंतर जोरदार आवाज उठाई . यह सब उनके पिता को अच्छा नहीं लगा और एक दिन उन्होंने कहा - तुम प्रचलित परम्पराओं का विरोध करना छोड़ दो नहीं तो तुम मेरा यह घर छोड़ दो . अपने आदर्शों के प्रति निष्ठावान राममोहनराय ने घर छोड़ना स्वीकार कर लिया परन्तु अपने आदर्शों और सिद्धांतों को नहीं छोड़ा और जीवन भर अपने सिद्धांतों की खातिर अविवेक और अंधविश्वास का डटकर विरोध करते रहें .

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7.2.12

सच्चा धर्म मानवता की सेवा करना है ...

एक बार एक संत महापुरुष अपने शिष्यों के साथ कुम्भ मेले में स्नान करने गए वहां पहुँच कर उन्होंने देखा की मेले में तरह तरह के साधु संत पहुंचे थे . उन्होंने ध्यान से देखा की साधु अपने सामने एक चादर बिछाकर बैठा था और अपनी ऑंखें बंद कर माला फेर रहा था बीच बीच में वह अपनी ऑंखें खोलकर यह देख लेता था की उसे अभी तक कितना दान मिल गया है . यह सब देखकर संत जी मुस्कुरा पड़े और थोड़ी दूर वह आगे बढे तो उन्होंने देखा एक साधु एक हाथ ऊपर उठाकर अपनी एक टांग के बल पर खड़ा है और उसने अपने सामने कुछ पैसे भी फैलाकर डाल रखें हैं तो उन्हें फिर से हंसी आ गई .

एक जगह उन्होंने देखा की भागवत कथा चल रही है और चीर हरण का प्रसंग खूब रस ले लेकर सुनाया जा रहा है और उनके चेले गाँजे के नशे में धुत्त होकर हा हा ही ही कर रहे हैं . मेले में एक टेंट देखा वहां रोगियों की भारी भीड़ जमा थी और वहां उपचार करने के लिए एक मात्र चिकित्सक उपस्थित था और वह भारी भीड़ को देखकर भी विचलित हुए वगैर पूर्ण मनोभाव से एक एक रोगी का उपचार कर रहा था और सारे दिन वह रोगियों का उपचार कर रहा था यह सब देख कर संत महापुरुष की आँखों में आंसू आ गए .

संत जी से उनके शिष्यों ने पूछा की आप पहले साधुओं को देख कर हँसे थे फिर भागवत कथा सुनकर हँसे थे और बाद में आपकी आँखों में आंसू क्यों आ गए थे ? . शिष्यों पहली बार मैं इसीलिए हंसा था की मेले में कुछ लोग धर्म के नाम पर ढोंग कर रहे थे और कथा और योग के नाम पर व्यवसाय कर रहे थे परन्तु मेले में ईश्वर के नाम पर लोगों की सच्ची मानव सेवा करने वाला वह चिकित्सक था जिसे देख कर मेरी आँखों में आंसू आ गए थे जो तन मन से रोगियों का उपचार कर रहा था . सच्चा धर्म संसार और मानव की सेवा करना है . सच्चा धर्म वह है जो लोगों के पतनोन्मुख विचारों को बदल सकें .

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31.12.11

जा रहा है बचपन आ रहा पचपन ....

सुबह सुबह अच्छी खासी नींद लगी थी की बच्चों का शोरगुल सुना तो नींद खुल गई . कमरे से बाहर निकल कर देखा की परिवार के बच्चे कह रहे थे आज इकतीस दिसंबर है और कल एक जनवरी है अच्छी खासी पार्टी का जुगाड़ होगा . केक तो कटवा के रहेंगें चाहे कुछ भी हो अपने दादा (परिवार के बच्चे अब मुझे दादा संबोधित करते हैं) अब पचपन की और जा रहे हैं . पचपन की बात सुनकर मेरे तो कान खड़े हो गए और मुझसे रहा न गया .

मुस्कुराकर मैंने बच्चों से पूछा - क्या बात है क्या पार्टी सार्टी का जुगाड़ हो रहा है . एक छोटा सी बालिका जिससे रहा न गया तड से बोली - ताऊ कल आपकी जेब काटने की तैयारी चल रही है कल आपका एक जनवरी जन्मदिन जो है . कल एक जनवरी को मेरा जन्मदिन है . ५४ वर्ष की आयु पूर्ण कर मैं पचपनवे वर्ष में प्रवेश कर रहा हूँ . जितना उल्लास और उमंगें बचपन में जन्मदिन को लेकर रहता था अब वैसा उत्साह जन्मदिन मनाने के लिए नहीं रहता हैं .

जब तक माता पिता साथ रहते हैं तब तक जन्मदिन मनाने का अंदाज और उत्साह कुछ अलग ही होता है . हमेशा मेरे माता और पिता मेरे जन्मदिन को लेकर काफी खुश रहते थे और परिवार में मेरे जन्मदिन के अवसर पर रामायण पाठ आदि के कार्यक्रम आयोजित किये जाते थे . आयु बढ़ने के साथ साथ पारिवारिक जिम्मेदारी बढ़ती ही जाती हैं . बचपन से अब पचपन की ओर बढ़ने से निश्चय ही पारिवारिक जिम्मेदारी भी बढ़ेगी और मुझे अपने दायित्वों का निर्वहन करना ही पड़ेगा जैसा की सभी के साथ होता है .

ईश्वर की कृपा से सब बढ़िया चल रहा है . बालक सर्विस में है . श्रीमतीजी भी सेवारत हैं . मुझे कोई रोग शोक नहीं है . जीवन में कुछ नया करने की सोच लेकर दो वर्ष पूर्व सेवानिवृत्ति ले ली थी और पल पल जीवन आनंद से गुजर रहा है . बस इतनी चाहत रहती है की सब खुश रहे और आनंद मय जीवन व्यतीत करें . वास्तव में बचपन की आयु के और पचपन की आयु के अनुभवों में खासा अंतर तो होता ही है बस इन दौरों के अनुभवों को अपने अपने ढंग से खुश होकर ही जीना ही असल जिंदगी को जीना है एसा मैं भी अनुभव कर रहा हूँ .

कल एक जनवरी है और नव वर्ष के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई . आपका जीवन मंगलमय हो .

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